यूँही इन्ही दिनों धूप में बैठे अलसाते हुए अचानक एक ख़याल सरक आया मन में..

अभी खिलना शुरू ही हुआ था..के बस रुक गया फिर ..

तो हमने सोचा चलो अधूरा ही लिखे देते हैं आज ..

तो ये है ..धूप ..अधूरी

chk out :)

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धूप ..वही की वही ..वैसी की वैसी

कहीं कपड़ों को सुखाती ..तो कहीं पसीने में तर कर जाती है धूप

कहीं ज़मीनों में दरारें खुरेद्ती ..

तो कहीं खुशहाल पापड़ और वड़ीयान सुखाती ये धूप

बेशुमार धूप ..

कहीं कोमल पत्ते पर सरकती ओस की बूँद में मुस्काती ..

तो कहीं काया को झुलसाती ये धूप

कहीं गुनगुनी सी ..बस हलकी सी गर्म ..अलसाती धूप

तो कहीं छाँव को तरसाती चिलचिलाती धुप ..

पर देखें तो ये धूप है क्या ..

बस किसी के होने का एहसास ..

सूर्य .. आदित्य ..इसका स्रोत

इस सब से ऊपर..इस सब से परे ..

जो बस है..

या वैज्ञानिक दृष्टि में देखें..तो होता जा रहा है..

धूप के खिलवाड़ से बेखबर ..

इसे न धूप से ऊब ..और नाही इसकी मालकियत की हूक

वो तो बस है..

..to be continued..may be..may be not.. बस :)